कहाँ गए वो दिन जब जंजीरें भी तुम्हें होंसला देती थी
कहाँ गए वो दिन जब मुश्किलें ही तुम्हें मकसद देती थी
कहाँ हैं वो हिंद के पता-ए-दार जिनके लिए आज़ादी चाही थी
कहाँ हैं वो हिंद के सिपह-सालार जिनके ही लिए ये वतन मांगी थी
कहाँ गए वो दिन जब जंजीरें भी तुम्हें होंसला देती थी
अब आज़ादी की चादर में सोते हो तुम डर-डर के
घबराते हो इसी फटी-कुचली चादर के टुकड़ों को खोने से
तुम्हारी ख्वाहिशों के गुब्बारे तो नहीं हैं अब आसमां छूतेना ही, तुम्हारी सपनों की पतंगें ही हैं अपना हक मांगती
कहाँ गए वो दिन जब जंजीरें भी तुम्हें होंसला देती थी
क्या यही था वो वतन जो सबने सपनों में सजाया था
क्या यही था वो भारतवर्ष जिसके लिए सबने खून बहाया था
क्यूँ खोखली आज़ादी का हो तुम आज ढिंढोरा पीटते
क्यूँ नहीं फिर से लिख देते तुम अपने सपनों के भारत की कहानी
कहाँ गए वो दिन जब जंजीरें भी तुम्हें होंसला देती थी

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